{"vars":{"id": "125777:4967"}}

बीकानेर: 25 लाख के बीमा क्लेम मामले में उपभोक्ता आयोग का अहम आदेश, परिवादिनी को दी राहत

 
THE BIKANER NEWS:-बीकानेर। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, बीकानेर ने 25 लाख रुपये के एक बीमा क्लेम प्रकरण (परिवाद संख्या 136/2023) में उपभोक्ता हितों को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। आयोग ने परिवाद को तकनीकी रूप से 'प्री-मैच्योर' (समय पूर्व) मानते हुए भी परिवादिनी को राहत दी है और बीमा कंपनी को समयबद्ध तरीके से क्लेम का निस्तारण करने के निर्देश दिए हैं।

मामले के मुख्य बिंदु:

  • परिवादिनी: श्रीमती संतोष कंवर (पत्नी स्व. श्री लिछमण सिंह पंवार, निवासी बीकानेर)।
  • विपक्षीगण: बैंक ऑफ बड़ौदा (शाखा श्रीडूंगरगढ़) और स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस कंपनी लि.।
  • बीमा राशि: ₹25,00,000/- (पच्चीस लाख रुपये)।
  • आदेश की तिथि: 08 अप्रैल 2026

क्या था पूरा मामला?

​परिवादिनी श्रीमती संतोष कंवर के पति ने ₹25,00,000/- की एक बीमा पॉलिसी ली थी। 4 मई 2021 को उनके आकस्मिक निधन के बाद, परिवादिनी ने बीमा कंपनी से क्लेम की मांग की और बाद में जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।

आयोग का फैसला और निर्देश

​मामले में दोनों पक्षों की बहस और दस्तावेजों की जांच के बाद आयोग ने पाया कि परिवादिनी द्वारा बीमा कंपनी के समक्ष विधिवत और आवश्यक दस्तावेजों के साथ क्लेम प्रस्तुत करने का पर्याप्त प्रमाण रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है। इस आधार पर आयोग ने परिवाद को 'प्री-मैच्योर' माना।

​हालांकि, उपभोक्ता हितों की रक्षा करते हुए आयोग ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. परिवादिनी के लिए: आदेश की तिथि से 2 माह के भीतर संबंधित बीमा कंपनी के समक्ष सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ अपना क्लेम आवेदन प्रस्तुत करें।
  2. बीमा कंपनी के लिए: क्लेम आवेदन प्राप्त होने के 2 माह के भीतर विधि अनुसार उसका निस्तारण करें।
  3. पुनः अपील की छूट: यदि बीमा कंपनी निर्धारित समय में क्लेम का निपटारा नहीं करती है या परिवादिनी उनके निर्णय से असंतुष्ट रहती हैं, तो उन्हें पुनः आयोग के समक्ष परिवाद पेश करने की स्वतंत्रता होगी।

अधिवक्ता सुनीता अरोड़ा की सराहनीय पैरवी

​इस प्रकरण में परिवादिनी की ओर से अधिवक्ता सुनीता अरोड़ा ने सशक्त पैरवी की। उन्होंने आयोग के समक्ष सभी तथ्यों और विधिक पहलुओं को स्पष्ट रूप से रखा। उनकी इसी प्रभावी पैरवी के परिणामस्वरूप तकनीकी खामी के बावजूद परिवादिनी को न्याय प्राप्त करने का एक और न्यायसंगत अवसर मिल सका। उपभोक्ता हितों की रक्षा में उनकी इस भूमिका की सराहना की जा रही है।

​आयोग का यह आदेश न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता को सुदृढ़ करने और आम उपभोक्ताओं के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।