अनगिनत अंबाएँ’ उत्तर आधुनिक साहित्य की नाट्य कृति है-मधु आचार्य,*अनुवाद कर्म सृजनात्मक चुनौती है-मालचंद तिवाड़ी
समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार, रंगकर्मी एवं पत्रकार मधु आचार्य ने कहा कि ‘अनगिनत अंबाएँ’ राजस्थानी का उत्तर आधुनिक साहित्यिक नाटक है। जिसका मूल राजस्थानी कृति से हिन्दी में श्रेष्ठ अनुवाद होना एक अनुपम उदाहरण है। वैसे भी श्रेष्ठ अनुवाद करना मूल सृजन से अधिक महत्वपूर्ण एवं चुनौतीपूर्ण है। जिसका सफल निवर्हन मालचंद तिवाड़ी ने किया है।
मधु आचार्य ने आगे कहा कि कमल रंगा कि मूल कृति ‘अलेखूं अंबा’ का कथानक पौराणिक है, परन्तु उक्त पुरस्कृत नाट्य कृति समकालीन संदर्भ-आधुनिक बोध के साथ नारी की पीड़ा- वेदना एवं संवेदना को सशक्त ढंग से प्रगट करती है।
‘अनगिनत अंबाएँ’ कृति के अनुवादक वरिष्ठ साहित्यकार-आलोचक मालचंद तिवाड़ी ने कहा कि अनुवाद कर्म प्रेम का सृजनात्मक परिश्रम है। फिर भी अनुवाद कर्म को अक्सर दोयम दर्जे का लेखन मान लिया जाता है, जबकि इसकी चुनौती मौलिक सृजन से बढ़कर और जोखिम से भरी होती है। अर्थ और अभिप्राय को एक भाषा से दूसरी भाषा में उसकी पवित्रता को खंडित किए बिना रूपान्तरित करना सहज नहीं होता है।
मालचंद तिवाड़ी ने आगे कहा कि अलेखूं अंबा के अनुवाद में यह चुनौती इसके शीर्षक से ही शुरू हो गई थी, क्योंकि यह चर्चित नाटक महाभारत के उद्योग पर्व, आदि पर्व, शान्ति पर्व एवं भीष्म पर्व आदि के महत्वपूर्ण संदर्भांे को नई दृष्टि से देखने व समझने के साथ सृजित है।
इस अवसर पर मूल कृति के रचनाकार कमल रंगा ने कहा कि मालचंद तिवाड़ी ने बेहतरीन हिन्दी अनुवाद कर इस पुरस्कृत राजस्थानी नाटक को हिन्दी जगत के पाठकों तक पहँुचाने का महत्वपूर्ण सृजनात्मक उपक्रम किया है। इस अवसर पर अपनी रचना प्रक्रिया साझा करते हुए रंगा ने बताया कि पौराणिक कथानक के माध्यम से समकालीन संदर्भ को परोटना एक चुनौती है।
अनूदित कृति पर अपनी आलोचनात्मक बात रखते हुए राजस्थानी के वरिष्ठ साहित्यकार शंकरसिंह राजपुरोहित ने कहा कि नाटक का अनुवाद करना कठिन कार्य है, और खास तौर से पौराणिक कथानक के नाटक का श्रेष्ठ अनुवाद करना महत्वपूर्ण कार्य होता है। परन्तु मालचंद तिवाड़ी जैसे कुशल अनुवादक ही ऐसा श्रेष्ठ अनुवाद कर सकते थे। जो अपने आप में प्रशंसा योग्य है।
इसी क्रम में युवा साहित्यकार विप्लव व्यास ने अनूदित कृति पर अपनी आलोचनात्मक टीप रखते हुए कहा कि अनुवाद कर्म कला एवं विज्ञान के साथ मूल भाषा से हिन्दी में अनुवाद करना कठिन कार्य है, परन्तु यह अनुवाद अपनी श्रेष्ठता के कारण महत्वूपर्ण तो है ही साथ ही चर्चित भी होगा।
प्रारंभ में युवा कवि गिरिराज पारीक ने लोकार्पण समारोह की गरिमामय मंच एवं उपस्थितजनों का स्वागत करते हुए पुस्तक परिचय एवं अनुवादक का परिचय प्रस्तुत किया।
इस महत्वपूर्ण लोकार्पण समारोह में विभिन्न कलानुशासनों के गणमान्य यथा सरल विशारद, दीपचंद सांखला, नंदकिशोर सोलंकी, हरिशंकर आचार्य, रवि पुरोहित, राजेश रंगा, कृष्णचंद पुरोहित, डॉ. चंचला पाठक, शरद केवलिया, दयानंद शर्मा, अविनाश व्यास, राजेन्द्र जोशी, ज़ाकिर अदीब, डॉ. नमामि शंकर आचार्य, इन्द्रा व्यास, रवि शुक्ल, डॉ. असीत गोस्वामी, संजय पुरोहित, आत्माराम भाटी, बुलाकी शर्मा, प्रमोद शर्मा, मनीष जोशी, गोविन्द जोशी, डॉ. गौरीशंकर प्रजापत, मधुरिमा सिंह, बी.एल. नवीन, मदन जैरी, गंगाबिशन बिश्नोई, इसहाक हसन गौरी, संगीता शर्मा, धीरेन्द्र आचार्य, सुकान्त किराडू, घनश्याम सिंह, गोपाल गौत्तम, शारदा भारद्वाज, इसरार हसन कादरी, नंदकिशोर आचार्य, अशोक रंगा, गोपाल कुमार कंठित, बुनियाद हुसैन ज़हीन, नगेन्द्र किराडू, अशोक जोशी, अब्दुल शकूर बीकाणवी, महेश उपाध्याय, डॉ. फारूक चौहान, गिरिराज पारीक, ललित व्यास, आनंद छंगाणी, सागर सिद्दकी की गरिमामय साक्षी रही।
लोकार्पण समारोह का संचालन वरिष्ठ शायर क़ासिम बीकानेरी ने किया तो वहीं सभी का आभार वरिष्ठ साहित्यकार नगेन्द्र किराडू़ ने ज्ञापित किया।

