Movie prime

बीकानेर चिकित्सा विभाग का 'जादुई' अनुबंध: हनुमानगढ़ में तैनात कर्मचारी ने बीकानेर में कर दिए हस्ताक्षर!

 
,,
THE BIKANER NEWS:-बीकानेर। सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र (CHC) पाँचू के प्रशासनिक गलियारों से एक ऐसा 'चमत्कारी' मामला सामने आया है, जो राजस्थान के चिकित्सा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करता है। मामला सहायक लैब टेक्नीशियन किशन गोपाल छंगाणी के अनुबंध से जुड़ा है, जहाँ नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए कागजों पर 'टाइम ट्रैवल' (समय की यात्रा) का खेल खेला गया है।
गवाह की 'दिव्य दृष्टि' या सिस्टम का बड़ा फर्जीवाड़ा?
हैरानी की बात यह है कि दिनांक 01/04/2016 को निष्पादित बताए जा रहे एक अनुबंध में द्वितीय पक्षकार के गवाह के रूप में शशि कुमार (लेखाकार, NRHM) के हस्ताक्षर मौजूद हैं। सरकारी रिकॉर्ड की मानें तो उस समय शशि कुमार की पोस्टिंग बीकानेर के पाँचू में नहीं, बल्कि हनुमानगढ़ जिले के मक्कासर में थी। अब सवाल यह उठता है कि क्या मक्कासर में बैठा कर्मचारी पाँचू के अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के लिए 'दिव्य शक्ति' का प्रयोग कर रहा था या फिर यह विभाग की मिलीभगत से तैयार किया गया एक कूट-रचित (Forged) दस्तावेज है?
अनुबंध में हस्ताक्षर का 'लुका-छिपी' खेल
प्रार्थी किशन गोपाल छंगाणी के दावों ने विभाग की नींद उड़ा दी है। प्रार्थी का कहना है कि:
14/08/2019 तक उनके अनुबंध में प्रथम पक्षकार (कर्मचारी) के स्थान पर हस्ताक्षर ही नहीं हैं。
इसके विपरीत, उनके हस्ताक्षर द्वितीय पक्षकार (नियोक्ता/सरकार) के स्थान पर पाए गए हैं。
कानूनी दृष्टिकोण से, यदि कर्मचारी के स्थान पर हस्ताक्षर ही नहीं हैं, तो यह अनुबंध शून्य माना जाना चाहिए और कर्मचारी की निरंतर सेवा उसे 'स्थायी' होने के दावे की ओर ले जाती है。
सीएमएचओ कार्यालय की 'धृतराष्ट्र' नीति
इतने स्पष्ट साक्ष्यों के बावजूद, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) बीकानेर का कार्यालय अपनी आँखें मूँदे बैठा है। दिनांक 11/05/2026 को जारी पत्र (क्रमांक 8351) में विभाग ने बेशर्मी से जवाब दिया है कि "अनुभव प्रमाण-पत्र में कोई तकनीकी खामी नहीं है"। आरटीआई (RTI) से प्रमाणित दस्तावेजों में बिना मुहर और बिना हस्ताक्षर के कागजात खुद विभाग ने दिए हैं, और अब उन्हीं को 'त्रुटिहीन' बताकर पल्ला झाड़ा जा रहा है।
क्या यह भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा है?
यह मामला केवल एक कर्मचारी के अनुभव प्रमाण-पत्र का नहीं है, बल्कि यह विभाग के भीतर बैठे उन 'सफेदपोश' अधिकारियों के गठजोड़ का पर्दाफाश करता है जो पुराने फर्जीवाड़ों को दबाने के लिए नए झूठ बोल रहे हैं। जब गवाह ही घटनास्थल पर मौजूद नहीं था, तो अनुबंध की वैधता क्या है? क्या बीकानेर का चिकित्सा प्रशासन अब 'अंतर्यामी' कर्मचारियों के भरोसे चल रहा है?
जनता पूछ रही है—क्या इस 'जादुई' अनुबंध की जांच एसओजी (SOG) या एसीबी (ACB) करेगी, या फिर फाइल को 'तकनीकी शुद्धता' की चादर ओढ़ाकर हमेशा के लिए दफन कर दिया जाएगा?